कश्मीर जैसी रौनक हिमाचल के पालमपुर मे पाईये

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पालमपुर अपने सुहावने मौसम, बर्फीली धौलादार की पहाड़ियों, हरीभरी, ऊंची−नीची घाटियों, सर्पीली सड़कों और मीलों फैले चाय बागानों की सुंदरता से सैलानियों को आकर्षित करता है। समुद्रतल से 1,400 मीटर ऊंचाई पर बसा पालमपुर कभी अंग्रेजों की प्रमुख सैरगाह थी। अंग्रेजों ने यहां वैज्ञानिक ढंग से चाय के बड़े−बड़े बाग तैयार किये थे।

अप्रैल 1905 में आए भीषण भूकंप से यहां जानमाल की बहुत क्षति हुई थी। इस घटना के बाद अंग्रेजों का इस स्थान से मोहभंग हो गया। वे अपने बागों को स्थानीय लोगों के हाथों में सस्ते दामों में बेच कर चले गये। आज दो हजार हेक्टेयर भूमि में फैले चाय के बाग पालमपुर की शान हैं। इन्हीं विशाल बाग के कारण पालमपुर ‘टी सिटी’ के नाम से भी जाना जाता है।

पालमपुर का लगभग एक किलोमीटर लम्बा और शिमला के माल रोड़ जैसा बाजार सैलानियों को आकर्षित करता है। दिन भर बाजार में गहमागहमी रहती है। सड़क के दोनों ओर सजी−धजी भव्य दुकानें राह गुजरते लोगों को खरीदारी के लिए बरबस ही अपनी ओर खींचती हैं। बाजार से गुजरते सैलानियों की निगाहें जैसे ही सामने बर्फीले पहाड़ पर पड़ती हैं, वे मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।

पालमपुर आए सैलानियों के कदम सबसे पहले ‘न्यूगल पार्क’ की ओर ही बढ़ते हैं। तीन किलोमीटर दूर न्यूगल पार्क तक का सफर स्वयं में अनोखा अनुभव है। रास्ते के दोनों ओर चाय के बागों में पत्तियां तोड़ती महिलाओं के गीतों का उठता स्वर मन को छू लेता है। न्यूगल पार्क, न्यूगल नदी के डेढ़ सौ मीटर ऊपर एक पहाड़ी टीले पर अंडाकार स्थल पर है, जहां छोटी सी हिमानी नहर के साथ घास का लान और जलपान के लिए हिमाचल पर्यटन विभाग का कैफेटेरिया बना है। हिमानी न्यूगल नदी में मछली शिकार का मजा भी लिया जा सकता है। मत्स्य विभाग से परमिट ले कर इस खेल को दिन भर भी खेला जा सकता है।

न्यूगल पार्क से दो किलोमीटर दूर विंध्यवासिनी देवी का भव्य मंदिर है। मंदिर तक पहुंचने के लिए बस एवं टैक्सी की सुविधा है। यह स्थान आउटडोर फिल्म शूटिंग के लिए भी चर्चित रहा है। इस स्थान की दृश्यावली कश्मीर घाटी से पूरा मेल खाती है। यहां पर फिल्मों की शूटिंग भी चलती ही रहती हैं। यहां से आप घुघर नामक स्थान, जो पालमपुर से एक किलोमीटर दूर है, में संतोषी माता, काली माता और राधाकृष्ण मंदिरों के दर्शन भी कर सकते हैं।

पालमपुर से पांच किलोमीटर दूर एक खूबसूरत गांव चंदपुर देखने योग्य है। यहां सेना की छावनी के साथ चंदपुर टी एस्टेट के नाम से चाय का बड़ा बाग है। बाग के बीच चीड़ के घने वृक्षों में सैलानियों के ठहरने के लिए लकड़ी के आकर्षक घर बने हैं, जिन्हें कंट्री काटेज कहते हैं।

चंदपुर से चार किलोमीटर दूर लांघा भी अच्छा स्थल है। यहां जखणी माता का प्रसिद्ध मंदिर है। समुद्र तल से सात हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर तक टैक्सी सेवा सुलभ है। यदि आप पैदल चलने का साहस कर सकें तो इस यात्रा का मजा ही कुछ और है। चार किलोमीटर के इस मार्ग में जहां आसपास के प्राकृतिक दृश्यों को देख मन नहीं भरता वहीं रास्ते में पुरुष एवं महिलाएं अपनी भेड़−बकरियों के साथ मस्ती में नाचते−गाते पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। गोरा रंग और चांदी के गहनों में लदीफंदी ये महिलाएं किसी अप्सरा से कम नहीं लगतीं।

पालमपुर घूमने आए सैलानी 12 किलोमीटर दूर अंद्रेटा गांव में पद्मश्री सोभा सिंह की आर्ट गैलरी न देखें तो सफर अधूरा माना जाएगा। इस आर्ट गैलरी को देखने विश्व भर से लोग यहां आते हैं। रंगों का पर्व होली पालमपुर का विशेष त्यौहार है। इसे राज्यस्तरीय दर्जा प्राप्त है। चार दिवसीय इस त्यौहार को देखने देश−विदेश से लोग यहां आते हैं। आप भी यदि पालमपुर की होली का मजा लेना चाहें तो अपनी बुकिंग यहां के होटल आदि में पहले से ही करवा लें।

पालमपुर का निकटतम रेलवे स्टेशन पांच किलोमीटर दूर मारंडा है। मारंडा रेल मार्ग द्वारा पठानकोट से जुड़ा है। पठानकोट तक देश भर के अधिकांश नगरों से रेल सेवाएं हैं। मारंडा से बस व टैक्सी द्वारा पालमपुर पहुंचा जा सकता है।

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