नहीं रहे एशिया में सेरेमिक इंड्रस्ट्रीज के पहले शौधार्थी

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गोपेश्वर। गढ़वाल विश्ववद्यालय के डीन रहे अर्थशास्त्री प्रो० नारायण सिंह बिष्ट पहाड़ों में ही रह कर जीवन संघर्ष में शामिल लोगों के लिए एक मिशाल भी बने रहे हैं।उनके निधन से पहाड़ों में बसागत कर रही एक बड़ी आबादी को बड़ा झटका भी लगा है।चमोली जनपद के सड़क सुविधा से वंचित दशोली विकासखंड के दूरस्थ गांव सरतोली में जन्मे प्रोफेसर नारायण सिंह बिष्ट का जीवन संघर्षों से भरा रहा है।पुराने जमाने में भी आभावों के बीच शिक्षा ग्रहण कर उन्होंने रेशम विभाग से अदनी नौकरी पाकर सरकारी सेवा की शुरुआत की।इसके बावजूद उनके भीतर आगे बड़ी नौकरी में जाने का जज़्बा हिलोरे मार रहा था।सेवा के कुछ ही दिन बाद वे सहायक विकास अधिकारी उद्योग के पद पर काबिज़ होने में कामयाब हो गए।इसी दौर में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर उपाधि भी हासिल कर ली और कुछ की अंतराल के बाद वे डॉक्टरेट करने में भी कामयाब हो गए।कुछ समय बाद डॉक्टर बिष्ट गढ़वाल विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बनने में सफल हो गए।जीवन पर्यन्त अर्थशास्त्र विषय में वे बच्चों को पढ़ाने के साथ ही पारंगत भी हो गए। गढ़वाल विश्वविद्यालय में डीन रहते हुए उन्होंने एक अर्थशस्त्री के रूप में देश में अपनी विशिष्ट पहचान भी बनाई।यही वजह है कि एशिया पैसिफिक पर सेरेमिक इंडस्ट्री में वह पहले रिसर्च होल्डर भी रहे। उत्तराखंड के लिए सस्टेनेबल डेवलपमेंट पर उनके कई शोध भी प्रकाशित हुए। ये नहीं उन्हें प्लैनिंग कमीशन सदस्य के रूप में भी देश की सेवा करने का अवसर मिला।गढ़वाल मंडल विकास निगम के बोर्ड ऑफ डायरक्टर्स के पद पर भी रह कर उन्होंने निगम के आर्थिक हालातों में सुधार के लिए कई टिप्स भी दिए। अर्थशास्त्र पर उनके कई रिसर्च पेपर आज भी नहीं पीढ़ी के लिए शोध के विषय बने हुए हैं।देश के प्रमुख अर्थशास्त्रियों में शुमार बिष्ट की कोई राजनीतिक वर्ग में पहुंच न होने कारण वे मौजूदा दौर के पुरूस्कारों की भीड़ से भी दूर रहे।पत्नी सरला बिष्ट प्रधानाचार्य के पद से रिटायार हुई तो पति-पत्नी गोपेश्वर जैसे पहाड़ी कस्बे में ही अपना घर बना कर रहने लगे। इसी दौरान उन्होंने नारायण सेवा संस्थान के जरिए यहां के हालातों पर काम करना शुरू किया। निसंतान इस परिवार ने मौजूदा दौर में पहाड़ों से पलायन कर महानगरों की सुख सुविधा की परवाह किए बगैर पहाड़ी कस्बे गोपेश्वर में ही बसागत करना बेहतर समझा।य ही वजह है की जीवन के इस अंतिम पड़ाव में भी वे गोपेश्वर में ही जमे पड़े रहे।मौजूदा दौर में पलायन के चलते जब पहाड़ के गांव से लेकर बाज़ार तक खाली हो गए हैं तो तब प्रोफेसर बिष्ट यहां रह रहे लोगों के लिए सुख दुःख के साथी भी बन गए थे।अब जबकि पलायन ने पहाड़ों को खाली कर दिया है तो दिवंगत बिष्ट पलायन करने वालों लिए एक मिसाल भी बन गए ।88साल की उम्र में आज तड़के देहरादून के सी० एम् ०आई अस्पताल में अंतिम सांस लेकर वे इस दुनिया से चल बसे हैं।इसके बावजूद आम पहाड़ी जन मानस में वे अपना नाम छोड़ गए हैं।पहाड़ों की मौजूदा पीढ़ी के लिए पहाड़ों में ही बसागत कर वे एक नज़ीर भी बन गए हैं।गोपेश्वर के पालिका अध्यक्ष संदीप रावत का कहना है कि मौजूदा दौर में पहाड़ों से पलायन की समस्या चिंता का सबब बन गई है। ऐसे में दिवंगत बिष्ट हम सब के लिए एक बड़ी मिसाल के रूप में बहुत कुछ छोड़ गए हैं। जीवन में ऊचे मुकामो पर पहुंचना अच्छी बात है किन्तु ऐसे लोगों को अपनी पहाड़ की माटी की खुशबू से दूर न रहकर अपनी माटी से ही जुड़ा रहना चाहिए । इसी में पहाड़ों का भविष्य भी बेहतर रह सकता है। ऐसा नहीं हुआ तो फिर पहाड़ पलायन की त्रासदी की पीड़ा बयां करता ही रहेगा।

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